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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से प्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार ने आखिरकार मूर्त रूप ले लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने इस कदम से न केवल मंत्रिमंडल के खाली पदों को भरा है, बल्कि 2027 के चुनावी रण की तैयारी के संकेत भी दे दिए हैं। वहीं इस विस्तार को राज्य के क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधने की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के तौर पर भी देखा जा रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू हरिद्वार जनपद पर दिया गया विशेष ध्यान है। भाजपा ने यहां पुराने और नए के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। पांच बार के विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक की मंत्रिमंडल में वापसी यह दर्शाती है कि सरकार को अनुभवी रणनीतिकारों की दरकार है। वहीं, रुड़की के विधायक प्रदीप बत्रा को पहली बार मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपकर भाजपा ने पंजाबी समुदाय और शहरी मतदाता वर्ग को एक बड़ा संदेश दिया है। मैदान की राजनीति में इन दो नियुक्तियों को और मजबूती देने की कोशिश लग रही है।
दूसरी ओर, पहाड़ के प्रतिनिधित्व को भी इस विस्तार में पर्याप्त तवज्जो दी गई है। केदारघाटी यानी रुद्रप्रयाग से विधायक भरत सिंह चौधरी और नैनीताल जिले के भीमताल से विधायक राम सिंह कैड़ा को मंत्रिमंडल में शामिल करना कुमाऊं और गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों के बीच सत्ता के विकेंद्रीकरण का प्रयास है। विशेष रूप से राम सिंह कैड़ा के जरिए भाजपा ने कुमाऊं क्षेत्र में अपनी जमीन पकड़ को और पुख्ता करती दिख रही है। वहीं, राजधानी देहरादून की राजपुर विधानसभा से विधायक खजान दास को कैबिनेट में जगह देकर सरकार ने अनुसूचित जाति वर्ग के बीच अपनी पैठ को और गहरा करने का दांव खेला है।
जातीय समीकरणों की दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री धामी ने एक ‘सर्वसमावेशी’ गुलदस्ता तैयार करने की कोशिश की है। इसमें ठाकुर चेहरे के रूप में भरत सिंह चौधरी और राम सिंह कैड़ा हैं, तो ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के लिए मदन कौशिक को वापस लाया गया है। खजान दास के जरिए दलित समुदाय और प्रदीप बत्रा के माध्यम से पंजाबी बिरादरी को सत्ता में भागीदारी देकर धामी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे को धरातल पर उतारने का प्रयास किया है।
एक और उल्लेखनीय बात कि मदन कौशिक को छोड़कर बाकी चारों चेहरे खजान दास, भरत सिंह चौधरी, राम सिंह कैड़ा और प्रदीप बत्रा पहली बार मंत्री पद की शपथ ले रहे हैं। यह मुख्यमंत्री की उस रणनीति का हिस्सा नजर आता है जिसमें वह नई ऊर्जा और नए चेहरों के साथ सरकार की छवि को और अधिक जनसुलभ बनाने की सोच सामने रखते हैं।
लिहाजा, यह विस्तार मुख्यमंत्री धामी के बढ़ते राजनीतिक कद और केंद्रीय नेतृत्व के उन पर भरोसे की भी तस्दीक करता है। अब चुनौती इन नए मंत्रियों के सामने है कि वे बेहद कम समय में अपने-अपने क्षेत्रों की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरते हैं। 2027 की डगर कठिन है, लेकिन आज की यह ‘सियासी जुगत’ ने भाजपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में बताई जा रही है।
